Sunday, December 4, 2016

दो सच्ची कहानियां जिंदगी बचाने वालों की: सबसे अच्छी दुनिया वही है, जो अापके दर्द को सुने

एन. रघुरामन (मैनेजमेंट गुरु)
स्टोरी 1: 3 मार्च 2016 को टोल फ्री नंबर 18002334386 लगातार बज रहा था। टेलीफोन नंबर छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल का था। यह कॅरिअर हेल्प लाइन और काउंसिलिंग सेंटर के रूप में काम करता है। यह सेंटर ज्यादातर फाइनल एग्जाम के समय में संचालित किया जाता है ताकि अवसाद अथवा तनावपूर्ण
परिस्थितियों का सामना कर रहे विद्यार्थियों की मदद की जा सके। यह इन बच्चों को कोई अतिवादी कदम उठाने से भी रोकता है। यह पोस्ट आप नरेशजाँगङा डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम के सौजन्य से पढ़ रहे हैं। एग्ज़ीक्यूटिव ने फोन उठाया और खुद का परिचय दिया पर यह सुनकर उन्हें धक्का लगा, 'मैं आत्महत्या कर रही हूं।' उन्होंने पूछा, 'क्यों?' पता चला कि 19 वर्षीय छात्रा दो बार फेल हो चुकी थी और 12वीं कक्षा में उसने सालभर के लिए ड्रॉप लिया था। अब वह अगली सुबह अंग्रेजी की परीक्षा देने से बहुत घबरा रही थी। उन्होंने तत्काल फोन डॉ. वर्षा वरवंडकर को सौंप दिया, जो एजुकेशनल सायकोलॉजिस्ट हैं और परीक्षा के वक्त अपनी सेवाएं इस सेंटर को देती हैं। उन्होंने उसे बातचीत में उलझाया और पता लगाया कि उसके 'किसान' पिता ने उसे धमकी दी थी कि यदि इस बार वह 12वीं पास नहीं हो पाई तो वे उसकी शादी कर देंगे। उसे पक्का पता था कि वह परीक्षा पास नहीं कर पाएगी। वर्षा ने उसका आत्मविश्वास बढ़ाया और कहा कि इस बार वह सफल होगी। उन्होंने उससे स्कूल प्रिंसिपल का नाम पूछा। उन्होंने उसकी वह जानकारी एक कागज पर लिखी और अपनी रायपुर की मनोचिकित्सक सहयोगी डॉ. सोनिया परियाल को वह कागज दिया, जिन्होंने फोन नंबर लेकर स्कूल प्रिंसिपल से बात की। यह स्कूल रायपुर से 364 किलोमीटर दूर सरगुजा जिले में था। प्रिंसिपल ने तत्काल एक शिक्षिका को बुलाया। एक अन्य शिक्षक की मदद से वे छात्रा के घर पहुंचे। इस बीच, प्रिंसिपल ने उसके पिता का पता लगाया और सारे लोग वहां इकट्‌ठा हो गए, जहां से वह छात्रा बोल रही थी। यह सब 25 मिनट में हो गया। वर्षा ने उस छात्रा को सबके वहां पहुंचने तक बातचीत में उलझाए रखा और इस तरह उस दिन एक जान बच गई। इस साल अप्रैल में वह लड़की सिर्फ ग्रेस अंकों के साथ अंग्रेजी में पास हुई और अब कॉलेज के पहले साल में पढ़ रही है। अब तक उसकी शादी नहीं हुई है। 
स्टोरी 2: मैंने जीवन बदलने वाली जो कुछ किताबें पढ़ी हैं उनमें विक्टर फ्रेंकल की 'मैन्स सर्च फार मिनिंग' शामिल है। फ्रेंकल 20वीं सदी के महान मनोचिकित्सक थे, जो नाजी जर्मनी के मौत के कैंप से बच निकले थे। फ्रेंकल एक महिला की कहानी सुनाते हैं, जिसने उन्हें आधी रात को फोन करके ठंडे स्वर में कहा कि वह आत्महत्या करने वाली है। फ्रेंकल ने उसे फोन पर उलझाए रखा अौर अवसाद की उसकी स्थिति को समझते हुए उसे जिंदगी जारी रखने के एक के बाद एक कई कारण बताए। आखिरकार वह मान गई कि वह अपनी जान नहीं लेगी और उसने यह वादा निभाया। बाद में जब वे मिले तो फ्रेंकल ने पूछा कि उनके द्वारा दिए किस कारण ने उन्हें जिंदगी बनाए रखने के लिए प्रेरित किया? उसने बताया, 'उनमें से कोई भी नहीं।' उन्होंने फिर जोर देकर पूछा, 'तो किस बाद ने उसे जिंदगी जारी रखने के लिए प्रेरित किया।' उसका जवाब आसान था कि आधी रात को उसकी बात सुनने की फ्रेंकल की तैयारी ने उसे जिंदा रहने पर मजबूर किया। बहुत बुद्धिमानी भरी दलीलें फर्क पैदा नहीं करतीं। कभी-कभी सुनने की छोटी-सी क्रिया ही वह सबसे बड़ा तोहफा होता है, जो हम किसी को दे सकते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि आत्महत्या का विचार रखने वाला हर व्यक्ति हमेशा ही किसी से बात करने की कोशिश करता है ताकि वह आखिरी बार अपनी सोच किसी के सामने व्यक्त कर सके। और वह कोई यदि इसकी गंभीरता समझ सके तो वह सिर्फ बात सुनकर ही जिंदगी बचा सकता है, क्योंकि ऐसे व्यक्ति को सिर्फ एक ऐसा कान चाहिए होता है, जो धैर्यपूर्वक उसकी बात सुन सके। 
फंडा यह है कि वह दुनिया, जिसमें कोई व्यक्ति किसी दूसरे की तकलीफ सुनने को तैयार है, जीने लायक तो जरूर होती है। 
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साभारजागरण समाचार 
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